Shivji Somvar Vrat Katha, पूजा विधि और व्रत करने के नियम

 हिंदु परम्पराओं के अंदर Somvar का Vrat Bhagawan Shiv के लिए किया जाता है |

Somvar का Vrat करने से वांछित फल की प्राप्ति होती है। Somvar का Vratदिन के तीसरे पहर तक होता है और इस Vrat के अंदर फलाहार liya जा सकता है ‌‌‌Somvar का Vrat करने के बाद Shivऔर Parwati का पूजन किया जाता है।

Somvar का Vrat मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं। साधारण प्रति Somvar, सोम्य प्रदोष और Solah Somvar।




सोमवार व्रत कथा(Somvar Vrat Katha)

एक Gauv मे साहुकार रहता था उसकी कोई Santan नही थी उसके घर मे धन Daulat की कोई कमी नही थी 

 किसी Sadhu ने उसे बताया की वह Somvar का Vrat karega तो उसे पुत्र प्राप्त हो जायेगा 

 इस कारण वह प्रत्येक Somvar का Vrat करने लगा 

 साथ ही वह पुरी श्रद्धा के साथ शिव मंदीर जाकर पुजा पाठ करने लगा ‌‌‌

 उस साहुकार की भक्ति देखकर माता पार्वती Bhawgawan Shiv से आग्रह करकर कहती है कि वे उस साहुकार की मनोकामना पुरी करें । 

माता Parvati की यह बात सुनकर Bhawgawan Shiv ने कहा की है Parvati इस संसार मे सभी को अपने कर्मों का फल भोगना पडता है।

 लेकीन Parvati ने Bhawgawan Shiv की बात नही मानी ओर साहुकार की इछा पुरी ‌‌‌करने का आग्रह करती है। 

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‌‌‌माता Parvati के आग्रह पर Bhawgawan Shiv ने उस साहुकर को पुत्र प्राप्ती का वरदान तो दे दिया पर साथ मे यह भी कहा की इसकी आयु केवल बाहर वर्ष की होगी । 

माता पार्वती ओर भगवन शिव की यह बात साहुकार सुन रहा था ।

 उसे इस बात की खुशी थी और ना ही दुख था । कुछ समय के बाद साहुकार के घर मे पुत्र का जन्म हुआ ।‌‌‌ 

जब वह Putra 11 वर्ष को हुआ तो Putra के मामा को बुलवाकर उसे बहुत सार धन दिया ओर कहा की इसे ‌‌‌पढाई के लिये काशी ले जावे ओर मार्ग में यज्ञ भी करे ।

 जाहा भी करे वहा ब्राह्मणों को Bhojan कराते और दक्षिणा देते हुए आगे चलते जाना । 

2 मामा भानजे इसी तरह से यज्ञ कराने के बाद वे ब्राह्मणों को  दक्षिणा देते हुए आगे चलते गये 

 ‌‌‌रात्री हो गयी इस लिये वे मार्ग मे एक नगर मे रुके , नगर मे वे रुके थे वहा के राजा की कन्या का विवाह था । 

‌‌‌लेकिन ‌‌‌जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आख से काना था ,इस बात को छुपाने के राजकुमार के पिता ने एक चाल सोची ।

 उसने साहुकार के पुत्र को देखकर यह ‌‌‌सोचा कि क्यो न इस लडके को ‌‌‌राजकुमार बनाकर विवाह करा कर जो धन देगे वो इस को देकर राजकुमारी को अपने साथ ले जाऊंगा ।

 लडके को Rajkumar के वस्त्र  पहनाकर विवाह करा दिया ।

 मगर साहुकार का पुत्र ईमानदार था ,वह राजकुमारी के वस्त्र पर ‌‌‌लिख दिया की तुमहारा विवाह मेरे साथ हुआ है , पर जिसके साथ तुमहे भेजा जायगा वह एक आख से  ‌‌‌काना है ,मे तो कासी पडने जा रहा हुं ।

 जब यह बात Rajkumari ने अपनी चुन्नी  पर ‌‌‌लिखी पायी तो वह यह बात अपने माता पिता को बता दी । 

राजा को यह बात पता चलने के कारण से वह अपनी पुत्री को विदा नही किया , जिससे बरात वापस चली गई ।

 साथ ही साहुकार का Putra भी काशी चला गया वहा पहुचकर वहापर पर साहुकार ‌‌‌के ‌‌‌पुत्र‌‌‌ ने यज्ञ कराया । 

जिस दिन Ladke  की ayu 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया । लडके ने अपने मामा को कहा की मेरी तबीयत कुछ खराब है , तब लडके के मामा ने कहा की तुम अन्दर जाकर अराम करो ।

 Bhagawan Shiv के ‌‌‌वरदान के अनुसार उस बालक के प्राण ‌‌‌निकल गये । 

मृत भांजे को देखकर मामा रोने लगा । उसी समय माता Parvati व  Bhagawan Shiv उधर से जा रहे थे , ‌‌‌ पार्वती ने Bhagawan Shiv को कहा की स्वामी मुझे  इसके रोने के स्वर सहन नही हो रहे है , आप इस को कष्ट से अवश्य ‌‌‌दूर करे ।

जब Bhagawan Shiv मृत बालक के पास गये तो पार्वती से कहा की यह वही बालक है जिसको मेने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था । 

अब इसका समय समाप्त हो गया है , ‌‌‌मगर माता Parvati ने कहा की है स्वामी आप इस बालक को ओर आयु देने की कृपा करे वरना इसके कारण इसके माता पिता भी मर जायेगें ।

 माता कें आग्रह से Bhagawan Shiv ने उसे ‌‌‌जीवित होने का वरदान दे दिया । 

वह बालक शिक्षा पुरी करकर अपने मामा के साथ अपनी नगर की ओर लोट चला । ‌‌‌दानो चलते हुए उसी नगर मे पहुचे जहा उसका विवाह हुआ ।

 उस नगर मे भी उन्होने यज्ञ का आयोजन किया था मगर उस नगर का राजा यानी लडके के ससुर ने उन्हें पहचान लिया था । 

Raja ने उस लडके की ‌‌‌खातिरदारी की ओर बादमे अपनी पुत्री को उसके साथ विदा कर दिया ।

‌‌‌साहुकार ओर उसकी पत्नी दोनो ने यह प्रण ले लिया था कि अगर Putra जीवित नही लोटा तो वे भुखे प्यासे ही मर जायगें ।

 अपने पुत्र को जीवित पाकर बहुत प्रसन्न हुए । उसी रात Bhagawan Shiv ने साहुकार को स्वप्न मे आकर कहा की है 

साहुकार में तुम्हारे Somvar के Vrat  करने से अत्यन्त प्रसन्न हुआ जिसके कारण मेने ‌‌‌तुम्हारे पुत्र की आयु सो वर्ष कर दी है । इसी प्रकार जो भी मेरे Vrat करेगा उसकी सभी मनोकामना पुरी होगी ।

solah somvar vrat katha pdf


Shivji Somvar Vrat के लिए आरती

यदि आप सोमवार का व्रत करते हैं तो आपको भगवान शिव की आरती भी करनी चाहिए इसके लिए नीचे आरती दी जा रही है। आप इसको मोबाइल के अंदर भी चला सकते हैं और इसके साथ साथ मन मे गुन गुना सकते हैं या पढ़कर कर सकते हैं।

जय शिव ओंकारा जय शिव ओंकारा |
ब्रह्माविष्णुसदाशिव अर्दाडी धारा || टेक
एकाननचतुराननपंचानन राजे |
हंसानन गरुडासन बर्षवाहन साजै || जय
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अते सोहै |

तीनो रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहै || जय
अक्षयमाला वन माला मुंड माला धारी |

त्रिपुरारी कंसारी वर माला धारो || जय
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे |

सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे || जय
कर मे श्रेष्ठ कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता |

जग – कर्ता जग – हर्ता जग पालन कर्ता || जय
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव जानत अविवेका |

प्रणवाक्षर के मध्य ये तीनो एका || जय
त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई गावे |

कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे || जय

शिव चालीसा (Shiv Chalisa)

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन,
मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम,
देहु अभय वरदान ॥


॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥







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